Publish Date: Fri, 12 Jun 2026 11:51 AM (IST)
घाटशिला : सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े दावों के बीच झारखंड के घाटशिला से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे दुर्गाधन गोराई प्रखंड कार्यालय के बाहर हाथ में तख्ती लेकर धरने पर बैठ गए। तख्ती पर लिखी उनकी दर्दभरी अपील थी—"मैं जीना चाहता हूं सर, मेरा डॉक्यूमेंट बना दीजिए।"
बीमारी से लड़ रहे इस मरीज की सबसे बड़ी लड़ाई अब कैंसर से नहीं, बल्कि सरकारी कागजी प्रक्रियाओं से हो गई है। पिछले छह महीनों से दस्तावेजों में नाम सुधार कराने के लिए दफ्तर-दफ्तर भटक रहे दुर्गाधन को अब तक कोई राहत नहीं मिल सकी है।
छह महीने से कार्यालयों के चक्कर, समाधान अब भी दूर.....
जानकारी के अनुसार दुर्गाधन गोराई के आधार कार्ड और राशन कार्ड में नाम अलग-अलग दर्ज है। इसी विसंगति के कारण उनका आयुष्मान भारत कार्ड नहीं बन पा रहा है। आयुष्मान कार्ड नहीं बनने से उन्हें इलाज में मिलने वाली सरकारी सहायता का लाभ भी नहीं मिल रहा है।
दुर्गाधन ने कई बार संबंधित विभागों में आवेदन दिया, अधिकारियों से मुलाकात की और अपनी समस्या बताई, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। कैंसर के इलाज में पहले ही उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो चुकी है और अब आयुष्मान योजना से मिलने वाली सहायता उनकी अंतिम उम्मीद बन गई है।
इलाज के पैसे खत्म, धरने पर बैठने को मजबूर......
बीमारी और आर्थिक संकट से जूझ रहे दुर्गाधन ने आखिरकार अपनी आवाज बुलंद करने के लिए धरने का रास्ता चुना। प्रखंड कार्यालय के बाहर हाथ में तख्ती लेकर बैठे इस कैंसर मरीज की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की समस्याओं का समय पर समाधान नहीं होगा तो सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। लोगों ने मामले में तत्काल हस्तक्षेप कर राहत देने की मांग की है।
एक कागजी गलती ने रोक दिया इलाज का सहारा......
यह मामला केवल एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की तस्वीर भी पेश करता है, जहां एक छोटी सी दस्तावेजी त्रुटि किसी की जिंदगी पर भारी पड़ सकती है। डिजिटल इंडिया और पारदर्शी प्रशासन के दावों के बीच एक कैंसर मरीज छह महीने तक दस्तावेजों में सुधार के लिए भटकता रहा, लेकिन उसे समय पर मदद नहीं मिल सकी. विशेषज्ञों का मानना है कि गंभीर मरीजों से जुड़े मामलों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए त्वरित समाधान की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि किसी की जिंदगी केवल कागजी प्रक्रिया में उलझकर न रह जाए।
प्रशासन ने क्या कहा?......
मामले पर प्रखंड खाद्य आपूर्ति पदाधिकारी ने बताया कि संबंधित आवेदन जिला आपूर्ति पदाधिकारी को भेज दिया गया है। वहां से इसे आगे संबंधित विभाग और राष्ट्रीय सूचना आयोग को प्रेषित किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई की जा रही है. हालांकि सबसे बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है—क्या एक गंभीर कैंसर मरीज की जिंदगी से बड़ा कोई कागजी नियम हो सकता है?
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